Tuesday, August 4, 2009

'तेल की नौकरी' में ठगी का खेल!!!

'भोज राजा' अक्सर हमसे कहा करते हैं- गंगू ये दुनिया बड़ी धोखेबाज है। लोग ऐसे रंग बदलते हैं कि गिरकिट भी शरमा जाए। तू ऐसे लोगों से सम्भलकर रहना...। मगर अपने-राम भी सोचते थे कि अगर हम किसी के साथ अच्छा करेंगे, तो कौन कम्बख्त हमको छलेगा, लेकिन अभी-अभी अखबारों में खबरें देखी तो माथा भन्ना गया। धोखेबाजों की जमात तो अपनी 'तेल नगरिया' तक भी पहुंच गई है।
दो रोज पहले राजस्थान के एक बड़े अखबार राजस्थान पत्रिका में खबर छपी- 'तेल की नौकरी' में ठगी का खेल!!! खबरचियों ने लिखा कि :-
अगर आप किसी नामी तेल-गैस कम्पनी से नौकरी का बुलावा पाकर खुश हैं, तो संभल जाइए। यह प्रस्ताव किसी बड़ी ठगी का हिस्सा भी हो सकता है। तेल-गैस उत्पादन में प्रगति के साथ ही इस क्षेत्र में नौकरी का झांसा देकर रुपए ऐंठने वाला गिरोह भी सक्रिय हो गया है। विदेशी धरती पर बैठे इस गिरोह के सरगना इंटरनेट के जरिए पूरे देश में जड़ें फैला रहे हैं। मारवाड़ तक भी इनकी पहुंच हो चुकी है। राहत की बात यह है कि फिलहाल इनके झांसे में फंसने का कोई मामला सामने नहीं आया है, लेकिन जोधपुर सहित संभाग के बाड़मेर एवं जालोर जिले में कई युवाओं को ऐसे फर्जी बुलावा पत्र (कॉल लैटर्स) एवं अनुबंध पत्र (कॉन्ट्रैक्ट लैटर) ईमेल से मिले हैं।
बड़ी तनख्वाह का झांसा
ई-मेल के जरिए नियुक्ति पत्र भेजने वाली ये कम्पनियां बड़ी तनख्वाह का लालच देकर युवाओं को फांस लेती हैं। एक युवक को मिले ऑफर लैटर में सेल्स मैनेजर पद के लिए 9500 पाउंड (तकरीबन साढ़े सात लाख रुपए) मासिक वेतन का प्रस्ताव दिया गया है। इसके अलावा भारत से ब्रिटेन आने-जाने का खर्च, रहने की व्यवस्था एवं अत्याधुनिक लैपटॉप सहित अन्य फायदे भी गिनाए गए हैं।
'शेल' के नाम का इस्तेमाल
ज्यादातर ऑफर लैटर लंदन (यूके) की शेल ऑयल कम्पनी के नाम से भेजे जा रहे हैं, लेकिन इनमें कम्पनी का पता, ई-मेल एवं फोन नम्बर फर्जी हैं। शेल की भारतीय इकाई शेल इण्डिया ने भी नौकरी के इन प्रस्तावों को पूरी तरह झूठा करार दिया है। उनका कहना है कि- 'हम किसी तरह की नियुक्ति या प्रशिक्षण के लिए पैसे नहीं मांगते तथा नियुक्ति प्रक्रिया भी अलग है। यदि कोई शेल के नाम से नियुक्ति पत्र भेजकर पैसा मंगवाता है, तो इन्हें व्यक्तिगत जानकारी नहीं दें और तत्काल पुलिस को सूचित करें।' कम्पनी ने अपनी अधिकृत वेबसाइट पर भी इसका खुलासा कर दिया है।
ऐसे लेते हैं झांसे में...
रोजगार मुहैया करवाने वाली वेबसाइट्स से ई-मेल पते जुटाकर ये कम्पनियां आवेदकों से बायोडाटा मंगवाती हैं। महीने भर बाद आवेदक को ऑफर लैटर व कॉन्ट्रैक्ट लैटर भेजा जाता है। इसमें आवेदक को यह भी बता दिया जाता है कि वर्क परमिट एवं वीजा का खर्चा उसे खुद उठाना होगा। अगर कोई आवेदक कॉन्ट्रैक्ट लैटर पर हस्ताक्षर कर भेज देता है, तो उससे 50 हजार रुपए से एक लाख रुपए तक की मांग की जाती है।

Thursday, July 30, 2009

अगस्त में निकलेगा तेल

पूछिए मत जनाब! आज तो हमने पूरा एक किलो कलाकंद खाया। क्या करें, खुशी ही कुछ ऎसी है। सुबह आंख खुलते ही एक तेली ने सूचना दी। बोले- आपको पता भी है कि नहीं आज तो अखबार वालों ने जोरदार खबर दी है।
लिखते हैं कि- थार के धोरों से तेल उत्पादन की बाधाएं अब कुछ दूर होती दिख रही है। तेल अन्वेषक केयर्न इण्डिया ने इण्डियन ऑयल कॉरपोरेशन एवं ओएनजीसी की मंगलौर रिफाइनरी एवं पेट्राकेमिकल्स लिमिटेड के साथ तेल के बिक्री मूल्य पर हाथ मिला लिया है। वहीं, कम्पनी ने अगले महीने बाड़मेर से तेल दोहन शुरू करने का ऐलान किया है। केयर्न इण्डिया ने चालू वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही के नतीजे जारी करते हुए बुधवार को यह घोषणा की। यह पहला मौका है जब कम्पनी ने आधिकारिक रूप से इसका ऐलान किया है। केयर्न अब तक वर्ष 2009 की तिसरी तिमाही से तेल उत्पादन शुरू करने की बात ही कहती रही है। कम्पनी की इस घोषणा को राज्य में वैट को लेकर सरकार से चल रहे गतिरोध के मामले में भी सुलह के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।


तैयारी तो पूरी है ही....



कंपनी वाले तो पहले ही कह चुके हैं कि हमारी तैयारी पूरी है। यही बात दोहराई है। कम्पनी के मुताबिक फिलहाल 30 हजार बैरल रोजाना के उत्पादन एवं परिवहन की योजना है, लेकिन इस साल के आखिर तक 50 हजार बैरल प्रतिदिन की क्षमता जुटा ली जाएगी। बाड़मेर से गुजरात के सलाया तट तक जाने वाली पाइप लाइन का कार्य भी इसी अवधि में पूरा हो जाएगा। 600 किलोमीटर लम्बी पाइपलाइन में से 520 किलोमीटर पाइपलाइन की वेल्डिंग पूरी हो गई है तथा 400 किमी तक पाइप बिछा दिए गए हैं। गुजरात में वीरमगाव टर्मिनल पर पाइप लाइन का कार्य 90 फीसदी काम पूरा हो गया है।


खुद गए हैं 28 कुए


तेल दोहन के लिए कुओं को तैयार करने का कार्य भी युद्धस्तर पर चल रहा है। इसके लिए मंगला क्षेत्र में दो ड्रिलिंग रिग एवं एक कम्प्लीशन रिग काम कर रही हैं। फिलहाल यहां 28 कुएं खोदे गए हैं, जिसमें से 16 कुएं तेल उगलने को तैयार हैं। इसके अलावा तेली तो यह भी बता रहे हैं कि कम्पनी राजस्थान ब्लॉक में गैस उत्पादन बढ़ाने की भी संभावनाएं तलाश रही है। रागेश्वरी क्षेत्र में गैस की मात्रा के आकलन के लिए तीन और कुए खोदने की योजना है। इसकी तैयारी चल रही है। केयर्न को इस क्षेत्र में गैस की मात्रा दुगुने से ज्यादा होने की उम्मीद है। तो गुरु, अपनी तो निकल पड़ेगी.....

Sunday, July 26, 2009

जैसलमेर में भी गुड-न्यूज

तेल मण्डली के एक "बादशाह" ने कल ही इत्तला दी। बोले- जैसलमेर के लिए भी "गुड न्यूज" है। राज्य सरकार ने जैसलमेर स्थित दो तेल क्षेत्रों आरजे-ओएनएन-2005/1 और आरजे-ओएनएन-2005/2 के लिए पेट्रोलियम अन्वेषण लाइसेंस जारी कर दिया है। इसके तहत हिन्दुस्तान ऑयल एक्सप्लोरेशन कम्पनी लिमिटेड (एचओईसी) को इन दोनों ब्लॉक में तेल-गैस खोज करेगी। तकरीबन ढाई दशक से भी ज्यादा समय से यह कम्पनी तेल-गैस खोज के क्षेत्र में कार्य कर रही है। इस क्षेत्र में आने वाली देश की यह पहली निजी कम्पनी भी है। एचओईसी को न्यू एक्सप्लोरेशन लाइसेंसिंग पालिसी (नेल्प) के सातवें चरण में यह ब्लॉक आवंटित हुए थे। इसमें आरजे-ओएनएन-2005/1 ब्लॉक 1 हजार 424 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है, वहीं आरजे-ओएनएन-2005/2 ब्लॉक का क्षेत्रफल 1 हजार 518 वर्ग किलोमीटर तक है।दोनों ब्लॉक में क्रमश: 20 एवं 25 फीसदी की हिस्सेदार रखने वाली एचओईसी जहां एक ब्लॉक की संचालक भी खुद ही है, वहीं दूसरे ब्लॉक आरजे-ओएनएन-2005/2 में ऑयल इण्डिया को ऑपरेटर बनाया गया है। एचओईसी फिलहाल देश के सात तेल-गैस क्षेत्रों में अन्वेषण एवं उत्पादन कर रही है। इसमें कावेरी, काम्बे एवं असम-अरकान बेसिन शामिल हैं। सरकार ने नेल्प-7 के कायदों के मुताबिक एचओईसी को सात साल के लिए इन दोनों ब्लॉक की जिम्मेदारी सौंपी है। इसके लिए कम्पनी के लाइसेंस की वैधता गत 13 जुलाई से मानी जाएगी। कम्पनी अब यहां तकनीकी परीक्षण एवं सर्वे के माध्यम से तेल के भण्डारों का पता लगाएगी।
तो है ना गुड न्यूज...?

Friday, July 10, 2009

करोड़ों का हुआ 'कबाड़ा'

भगवान जाने, हमारे तेल को किसकी नजर लग गई है। ना सरकार मान रही है और ना ही कम्पनियां। बाड़मेर से निकलने वाले कच्चे तेल पर वैट वसूली की खींचतान के कारण तेल उत्पादन में ही देरी नहीं हो रही, अब तो सरकार को करोड़ों रुपए के राजस्व से भी हाथ धोना पड़ रहा है। बीते दो महीनों में ही राजस्थान सरकार तकरीबन 500 करोड़ रुपए का राजस्व गंवा चुकी है। तेल मण्डली के एक 'तेली' ने बताया कि केयर्न इण्डिया ने तो पिछले मई महीने में ही तेल निकालने की तकनीकी तैयारी पूरी कर ली थी। कम्पनी की मई से ही दोहन शुरू करने की योजना भी थी। लेकिन जब सरकार ने इस तेल पर चार फीसदी वैट मांगा तो मामला अटक गया। 'तेली भाई' के अनुसार केयर्न इण्डिया एवं तेल की खरीदार कम्पनियां इस पर दो प्रतिशत सीएसटी (केन्द्रीय बिक्री कर) वसूलने का आग्रह कर रहीं हैं।

इसी खींचतान में राजस्थान की सरकार के हाथ से 500 करोड़ रुपए फिसल गए हैं। 'गणितज्ञ तेलियों' के अनुसार बाड़मेर से अगर मई में तेल उत्पादन शुरू हो जाता तो जून तक दो माह में राज्य सरकार को 500 करोड़ रुपए का राजस्व मिल सकता था। हकीकतन, मई में करीब 10 हजार बैरल प्रतिदिन तेल निकलने का अनुमान था, जो जून के आखिर तक बढ़ते-बढ़ते रोजाना 30 हजार बैरल तक पहुंच जाता। इस पर 65 डॉलर प्रति बैरल के अंतरराष्ट्रीय मूल्य से गणना करने पर राज्य सरकार को 10 से 12 करोड़ रुपए प्रतिदिन बतौर रॉयल्टी और बिक्री कर के रूप में मिल सकते थे।

पंगा यह है कि...

बाड़मेर में तेल खरीद केन्द्र होने के कारण राज्य सरकार यहां से निकलने वाले तेल पर चार फीसदी वैट मांग रही है, जबकि तेल खरीदार कम्पनियां और केयर्न इण्डिया अन्तरराज्यीय बेचान होने की वजह से केन्द्रीय बिक्री कर (सीएसटी) लगाने का आग्रह कर रही हैं। केयर्न ने इसके लिए सरकार के समक्ष कानूनी नजीरें भी पेश की हैं। उधर, वैट का मामला उलझने से कच्चे तेल का बिक्री-करार (कोसा) भी अटक गया है। फिलहाल यह मामला राजस्थान के अखबारों की सुर्खियां बना हुआ है।

- गंगू-तेली

Monday, July 6, 2009

कुण्डली (कविता)

गंगूजी-तेली कहे, सुनिए राजा भोज ।
जब निकलेगा तेल, तब होगी सबकी मौज ॥
होगी सबकी मौज, तभी तो मंत्री-चाकर ।
झांक रहे कुओं में, आंखें फाड़े जाकर ॥
कह 'गंगू' कविराय, बोलते बम-बम बेली ।
तेल-तेल की माला जपते सारे तेली॥

'मंगला' पर 'शनि की दशा'

लगता है राजस्थान के मंगल तेल क्षेत्र पर शनि की दशा चल रही है। तारीख पर तारीख पड़ती जा रही है, पर तेल दोहन है कि शुरू होने का नाम ही नहीं ले रहा। तकनीकी रूप से तैयार होने के बावजूद केयर्न इण्डिया का जल्दी-उत्पादन शुरू करने का मंसूबा भी पूरा नहीं पाया। राज्य सरकार और कम्पनी के बीच वैट मामले को लेकर गतिरोध के चलते अभी भी इस मामले में तस्वीर साफ नहीं हो पाई है। हालांकि पहले-पहले मई के आखिरी हफ्ते से तेल दोहन शुरू करने की कवायद चल रही थी। इस बारे में कम्पनी ने सीधे-सीधे तो ऐलान नहीं किया था, पर कई बार ऐसे संकेत दिए। इतना ही नहीं बाड़मेर के नगाणा स्थित मंगला प्रोसेसिंग टर्मिनल (एमपीटी) के तकनीकी रूप से तैयार होने में देरी को देखते हुए स्टार्ट-अप प्रोडक्शन पैकेज (सप) भी विकसित किया गया। इसमें कच्चे तेल से पानी एवं मिट्टïी के अंश अलग करने वाले छोटे सैपरेटर, बॉयलर एवं लोडिंग-बे समेत अन्य उपकरण लगाए गए, लेकिन राज्य सरकार की ओर से उत्पादित तेल पर स्थानीय कर यानी वैट की मांग के चलते इसमें रोड़ा अटक गया। अब कम्पनी और सरकार के बीच इस मुद्दे पर उच्चस्तरीय बातचीत का दौर जारी है, लेकिन मामला निर्णायक स्तर पर नहीं पहुंचा है।

'फल' रही है 'वाचा'

तेल दोहन शुरू करने के मामले में केयर्न की 'वाचा' फलीभूत हो रही है। कम्पनी ने शुरू में ही वर्ष 2009 की तीसरी तिमाही से तेल दोहन शुरू करने की घोषणा कर दी थी। मई में उत्पादन की तैयारी पूरी करने के बाद भी केयर्न ने इस पर जुबान नहीं खोली। आखिर अब शीघ्र तेल दोहन शुरू करने की इच्छा के बावजूद देरी का मुंह देखना पड़ रहा है।

कयासों का दौर


दोहन शुरू होने को लेकर अब भी कयास ही लग रहे हैं। जून का महीना भी सूखा गुजरने के बाद अब जुलाई दूसरे पखवाड़े से तेल दोहन शुरू होने की चर्चा है। वैसे, कम्पनी वाले तो अभी भी कुछ नहीं बोल रहे। अपने राम को यही चिंता है कि आखिर होगा क्या...?
जय राजा भोज की...
- गंगू-तेली

धोरे बुझाएंगे तेल की प्यास-3

राजस्थान में 1600 करोड़ निवेश करेगी ओएनजीसी
मंगला-भाग्यम-ऐश्वर्या तेल क्षेत्र की संशोधित विकास योजना को मंजूरी
एक और अच्छी खबर है। देश के सबसे बड़े जमीनी तेल भण्डार 'मंगला' के विकास के लिए तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) ने आखिर शनिवार को 'मंगल सौगात' दे दी । तेल की रॉयल्टी को लेकर खासे नखरे दिखाने के बाद अब ओएनजीसी ने बाड़मेर के इस वृहद तेल क्षेत्र में साढ़े तीन सौ मिलियन डॉलर (करीब 1 हजार 647 करोड़ रुपए) के और निवेश की हांमी भरी है। ओएनजीसी के निदेशक मण्डल ने इसके साथ ही केयर्न इण्डिया की संशोधित विकास योजना पर भी मंजूरी की मुहर लगा दी है।
इस फैसले से सरकार और ओनएजीसी के बीच रॉयल्टी को लेकर चल रही खींचतान भी कम होने की उम्मीद है। इसके अलावा राजस्थान के तेल क्षेत्र से ओएनजीसी की भागीदारी लौटाने की कुछ समय से चल रही अटकलों पर भी विराम लग जाएगा। राज्य में तेल दोहन को अच्छी गति मिलेगी, सो अलग। आप तो जानते ही हैं कि मंगला क्षेत्र की संचालक कम्पनी केयर्न इण्डिया ने यहां से तेल दोहन की तकनीकी तैयारी पूरी कर ली है और कम्पनी किसी भी क्षण उत्पादन शुरू करने को तैयार है।
यह भी जानिए...
ओएनजीसी ने मंगला क्षेत्र के विकास के लिए 1।241 बिलियन डॉलर से बढ़ाकर 2.396 बिलियन डॉलर की योजना पर सहमति जताई है। ऐश्वर्या तेल क्षेत्र के लिए 275 मिलियन डॉलर की संशोधित योजना को मंजूरी दी गई है। ओएनजीसी इस योजना का 30 फीसदी का हिस्सा खर्च करेगा। वहीं, भाग्यम क्षेत्र एवं तेल पाइप लाइन के विकास खर्च में कोई बदलाव नहीं हुआ है। संशोधित विकास योजना के बाद अब एमबीए (मंगला-भाग्यम-ऐश्वर्या) तेल क्षेत्र में ओएनजीसी का कुल हिस्सा 874।2 मिलियन डॉलर से बढ़कर 1.22 बिलियन डॉलर हो जाएगा।
योजना को मिलेगी रफ़्तार
तेल पर रॉयल्टी चुकाने की जिम्मेदारी के मसले पर 'तिरछी' चल रही ओएनजीसी ने केयर्न इण्डिया का रिवाइज्ड डवलपमेंट प्लान अटका दिया था। अब सरकार की ओर से रॉयल्टी भरपाई का भरोसा मिलने के बाद इसे मंजूरी दी गई है। दरअसल, राजस्थान तेल क्षेत्र में ओएनजीसी की 30 फीसदी हिस्सेदारी है, लेकिन पुरानी नीति के मुताबिक उसे यहां से निकलने वाले तेल पर केयर्न के हिस्से की भी रॉयल्टी चुकानी होगी।
- गंगू तेली

Friday, June 19, 2009

रबर मत खींचो, हाथ करीब लाओ....

बगैर मुंह धोए और कुल्ला घुमाए हमने सवेरे उठते ही परम्परागत अंदाज में अखबार खोला, तो खबर दिखी 'अदालत भी जा सकती है केयर्न।'
यकीन जानिए हुजूर.... तभी अपना तो दिल धक् से बैठ गया। गोया 1999 मॉडल की मारुति कार का इंजन घर्र-घर्र कर थम गया हो। गनीमत थी कि इंजन की तरह ना तो दिल घुर्राया और ना ही थमा, पर रसोईघर में प्रात:कालीन अमृतपान की तैयारी कर रही घरवाली गुर्रा उठी। चीखते हुए से उसने पूछा- अरे, क्या हुआ...??? अब, जवाब तो क्या देते? कह दिया- नहीं-कुछ नहीं हुआ, ऐसे ही.....। लेकिन दोस्त! सिर्फ कहने भर से हालात सुधर जाते तो ये ससुर का नाती पाकिस्तान तो कब का अपना यार बन गया होता। कम्बख्त चाईना वालों से भी अपन गलबहियां कर रहे होते। और तो और... सारे आतंकवादी अपने बाबू मुसद्दीलाल के स्वयं-सहायता-समूह से जुड़े समाजसेवी होते या म्युनिसिपलिटी के कर्मचारी। खैर... अपने-राम को पीड़ा इस बात की थी कि अब स्थितियां कहां से कहां तक आ पहुंची। देखिए ना, डेढ़ पखवाड़े पहले की ही तो बात है। तेल निकालने वाली कम्पनी के सीईओ राहुल बाबू कह रहे थे-'हमें सबका सहयोग मिल रहा है। सरकार और ओएनजीसी भी राजस्थान प्रोजेक्ट में हमें पूरा कॉपरेट कर रहे हैं।' पर महीने भर से भी कम वक्त में तस्वीर बदल गई। राजस्थान की सरकार तेल पर 'वैट' मांगने लगी और मांगने ही क्या साहब, वैट वसूलने पर अड़ गई। अब आप तो जानते ही हैं कि 'अडऩा' सबका बुरा होता है। घोड़ा अड़ा तो सवार की हड्डियां चूर, ट्रेन में चढ़ते वक्त कोई मोटा आदमी अड़ गया तो दूसरी सवारियों के ट्रेन छूटने की आशंका भरपूर और तो और गले में सिक्का या फांस, आंख में कंकर या फिर दिमाग में कोई विचार... अड़ा हुआ तो दिक्कत ही देता है। कहते हैं- अड़ा-अड़ी में तो पिद्दी पहलवान भी सूमो-जापानी को 'भचीडऩे' के चला जाता है।
खैर... अपनी सरकार अड़ी 'वैट' पर। हम भी मानते हैं साहब कि अपनी नौकरशाही 'वैट' लेने की आदी है और इसी के चक्कर में बेचारा 'भोलाराम का जीव' (हरिशंकर परसाई जी की व्यंग्य-कथा का पात्र) पेंशन की दरख्वास्त वाली फाइलों में ही अटका रह गया था, पर यहां तो उस तरह के 'वैट' यानी 'वजन' की बात भी नहीं। क्यों कि ये गिनती तो पहले ही सिलेसिलेवार लिखी जा चुकी है। 1-2-3-4 सबकी 'सेटिंग' पहले ही हो चुकी। आप इशारा तो समझ ही गए होंगे! खैर... यहां पर वैट के माइने हैं- वैल्यू एडेड टैक्स। दरअसल, तेल निकालने वाली कम्पनी कह रही है कि इस तेल को हमने खोजा (यह बात और है कि इस पर कई लोगों को आपत्ति है), हम इसको निकाल रहे हैं और काण्डला बंदरगाह तक अपने खर्चे से पहुंचा रहे हैं, तो वैट कैसा? वैट तो तब लगता जबकि तेल राजस्थान का राजस्थान में ही बेचा जाता। ...सो लेना ही है, तो सीएसटी (केन्द्रीय बिक्री कर) ले लो। दोनों तरह के करों में (टैक्स में) फर्क भी तगड़ा है। वैट 4 फीसदी है और सीएसटी केवल 2 प्रतिशत। लिहाजा अपनी सरकार ने भी जमा लिया अंगद का पांव। राजस्व वाले महकमे के प्रमुख खजांची ने अड़ंगा लगा दिया। बोले- तेल हमारी जमीन से निकाल रहे हो तो वैट ही लगेगा। तेल निकालने वालों ने खूब समझाया। बड़े पर्दे पर तस्वीरें दिखाकर प्रजेंटेशन दिया। कानून वालों की जुबानी कायदे गिनाए। ऊंची-ऊंची अदालतों के फैसले पढ़ाए, पर खजांची साहब तो 'ऊं-हूं ' के अलावा कुछ बोलते ही नहीं। तंग आकर ये भी बिचारे क्या करते...? आखिर कह ही दिया कि- सीधी उंगली से तेल नहीं निकला तो उंगली टेढ़ी करनी पड़ेगी। सरकार नहीं मानी तो अदालत जाएंगे। जज-साहब जो फैसला देंगे, वो मंजूर...।
खबरचियों ने इसी की खबरें छाप दीं। पढ़ते ही दिल को धक्का लगा। लाजिमी भी था। क्योंकि साहब! अपने-राम तो मानते हैं कि किसी बात को रबर की तरह खींचना ठीक नहीं। रबर का एक सिरा जो भी छोड़ता है, दूसरी ओर वाले को 'फ..टाक' से लगता है। चीख निकल जाती है पट्ठे की। ...सो अपने हिसाब से तो समझदारी इसी में है कि शांति से दोनों बात करें। हाथों को हौले-हौले करीब लाएं और आपस में मिला दें। इसी में हुजूरे-आला सबकी मौजां ही मौजां हो जाएगी। ना किसी को चोट लगेगी और ना होगा दर्द। पर मेरे मालिक, ऐसा हो तो सही....


- गंगू-तेली

Tuesday, June 16, 2009

धोरे बुझाएंगे तेल की प्यास-2



वैट कराए 'लेट'


तेल निकालने की सारी तैयारियां परवान चढ़ गईं हैं तो अब राज्य सरकार ने उत्पादित तेल पर केन्द्रीय बिक्रीकर (CST) की बजाय स्थानीय बिक्री कर यानी (VAT Tax) मांगकर नया अड़ंगा लगा दिया है। इसके चलते मई के अंतिम सप्ताह से उत्पादन शुरू करने जा रही तेल कम्पनी जून के दूसरा सप्ताह बीत जाने पर भी कोई निर्णय नहीं कर पा रही है। खबरनवीस बताते हैं कि प्रदेश में वैट मांगने का मुद्दा तो भाजपा शासनकाल से ही चला आ रहा है। अबके वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कुछ नरम हैं, पर सरकारी अफसरों ने कायदे गिनाकर वैट को सही बताया है। इस पर सहमति नहीं बनने के कारण केयर्न एनर्जी इण्डिया तथा खरीददार कम्पनियों के बीच क्रूड ऑयल सेल एग्रीमेंट (कोसा) नहीं हो पा रहा। बिना कोसा के थार में तेल का उत्पादन शुरू नहीं हो पाएगा।


झगड़े की जड़


गंगू-तेली को मिली खबरों के अनुसार झगड़े की जड़ तेल का डिलीवरी प्वाइंट है। सरकार शुरू से ही चाहती है कि तेल का डिलीवरी प्वाइंट राजस्थान में रहे। साल भर पहले जब पाइपलाइन बिछाकर इस तेल को गुजरात के बन्दरगाह तक ले जाने की बात उठी तब भी सरकार ने आपत्ति की थी। इससे राज्य सरकार को सीएसटी की जगह वैट मिलता और दुगुना फायदा होता। तेल निकालने वाली कम्पनी का कहना था कि पाइप लाइन बिछने पर तेल का डिलीवरी प्वाइंट राजस्थान नहीं हो सकता। पाइप लाइन का अंतिम छोर, जहां से तेल बेचा जाएगा, वहीं होगा। पर सरकार के दबाव में कम्पनी ने अंडरटेकिंग दे दी थी कि खरीद का केन्द्र राजस्थान में रहेगा और खरीददार कम्पनी को राज्य में अपना कार्यालय खोलना पड़ेगा। भाजपा की सरकार ने तो इसके बाद भी कम्पनी को राजस्थान से तेल ले जाने को पाइप लाइन बिछाने की अनुमति नहीं दी थी। कांग्रेस ने नरमी दिखाते हुए पाइप लाइन बिछाने की अनुमति तो दे दी, लेकिन वैट के मामले में मौजूदा सरकार ने भी अब तक कोई फैसला नहीं किया है। अब दिक्कत यह है कि जब तक यह तय नहीं हो जाता, तब तक तेल निकलना भी अटका रहेगा।


इक-दूजे को कानून गिनाएं


अब कम्पनी और सरकार दोनों एक-दूसरे को कानून गिना रहे हैं। कम्पनी ने तो दिल्ली-मुम्बई के धंतरसिंह कानूनियों से राय-मशविरा करके अपनी रिपोर्ट भी सरकार को सौंपी है, लेकिन कहीं से समझौते की खिचड़ी पकने की खुशबू नहीं आ रही है।
करोड़ों का खेलवैट का अडंगा यूं ही नहीं लगाया है। इसमें करोड़ों का खेल है। गंगू-तेली को मिली खबरों के मुताबिक राजस्थान को तेल की रॉयल्टी से हर साल करोड़ों रुपए मिलेंगे। इसमें अगर सरकार सीएसटी वसूलती है, तो उसे दो फीसदी ही टैक्स मिलेगा, जबकि वैट में टैक्स की रकम चार प्रतिशत होगी।


- गंगू तेली

Monday, June 15, 2009

धोरे बुझाएंगे देश की 'प्यास'

थार के रेतीले धोरे जल्द ही हिन्दुस्तान की तेल की प्यास बुझाने लगेंगे। इसके लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर तैयारी तेज हो गई है। तेल अन्वेषक कम्पनी द्वारा बाड़मेर में खोदे जा रहे तेल के कुओं को तकनीकी रूप से तैयार करने के लिए यहां तीन रिग काम कर रही हैं। इसमें दो ड्रिलिंग रिग्स एवं एक कम्प्लीशन रिग है। तेल-गैस क्षेत्र की नामवर सेवा प्रदाता जॉन एनर्जी कम्पनी ने करीब छह सौ होर्स पॉवर क्षमता की कम्प्लीशन रिग उपलब्ध करवाई है। यह रिग तेल के कुओं को उत्पादन से पूर्व अंतिम रूप देने का कार्य कर रही है। इसीलिए इस रिग को 'कम्प्लीशन रिग' का नाम दिया गया है। यह सभी रिग अभी बाड़मेर के मंगला तेल क्षेत्र में कार्य कर रही हैं।
तेल अन्वेषक कम्पनी केयर्न इण्डिया का दावा है कि कम्पनी तेल निकालने के लिए पूरी तरह से तैयार है। सरकार की हरी झण्डी मिलते ही तेल निकालने का काम शुरू हो जाएगा।
सरकार को 'वैट' चाहिए
आप तो जानते हैं कि सरकारी काम-काज बिना 'वैट' के नहीं होता। यानी जो भी फाइल सरकानी हो, उस पर वैट रख दो, खटके से पहुंच जाएगी ठिकाने पर। राजस्थान की सरकार को भी तेल पर वैट चाहिए। यह वैट 'उस तरह' का वैट तो नहीं है, लेकिन वैट तो वैट होता है जनाब। सरकार ने तेल पर वैट (VAT Tax) मांग लिया है। केयर्न एनर्जी इण्डिया कम्पनी इस पर सीएसटी देने को तैयार है। सीएसटी 2 प्रतिशत होता है, जबकि वैट 4 प्रतिशत होगा। इससे केयर्न का मुनाफा कम हो जाएगा। अब देखना यह है कि कम्पनी और सरकार का गतिरोध कब दूर होता पाता है। वैसे अखबार वाले साथी बताते हैं कि वैट के चक्कर में कम्पनी ने बाड़मेर में तेल निकालने का परीक्षण भी रोक लिया है। कम्पनी को 5 जून तक परीक्षण करना था।
जारी.......
- गंगू तेली

Saturday, June 13, 2009

तेल उगलेगा राजस्थान

प्रिय पाठकों,
राम-राम।
तेल के तराने में पहले-पहल राजस्थान के तेल क्षेत्र के बारे में मोटी-मोटी जानकारी दे रहा हूं। इसके बाद सिलसिलेवार और बातें करेंगे। आपके सुझाव आमंत्रित हैं...


थार का मरुस्थल अपनी अनूठी पारस्थितिकी के लिए जाना जाना है। रेत के इसी दरिया में छुपे हैं तेल के अकूत भण्डार। राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित नागाणा गांव में देश के अब तक के सबसे बड़े तेल भण्डार मिले हैं। इनसे अब तेल दोहन की तैयारी चल रही है। बाड़मेर बेसिन में स्थित इस क्षेत्र में तेल-गैस की खोज वर्ष 2002 में शुरू की गई थी। वर्ष 2004 में यहां मंगला फील्ड की खोज की गई। मंगला फील्ड राजस्थान का सबसे बड़ा ऑयल फील्ड है। यह आरजे-ओएन 90/1 ऑयल ब्लॉक का हिस्सा है। इस ब्लॉक में मंगला के अलावा ऐश्वर्या, भाग्यम, सरस्वती व रागेश्वरी ब्लॉक भी शामिल है। पूरा ब्लॉक तकरीबन साढ़े तीन हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। बाड़मेर बेसिन में 3.7 बिलियन बैरल तेल भंडार मौजूद है। यह ब्लॉक यू.के. की कम्पनी केयर्न एनर्जी की सहयोगी भारतीय कम्पनी केयर्न इण्डिया के पस है। यह कम्पनी मंगला, भाग्यम व ऐश्वर्या तेल क्षेत्र में दो बिलियन टन तेल के उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किए हुए है। शुरुआत में मंगला फील्ड में 7 से 8 हजार बैरल तेल का उत्पादन किया जाएगा। महीने भर में इसे बढ़ाकर 30 हजार बैरल तेल तक पहुंचाया जाएगा तथा दो साल में रोजाना पौने दो लाख बैरल तेल का उत्पादन होने लगेगा। कम्पनी ने अपनी ओर से इसके लिए तैयारी कर ली है, लेकिन तेल के बिक्री मूल्य को लेकर मामला अटका हुआ है। फिर भी उम्मीद जताई जा रही है कि जुलाई तक राजस्थान से तेल उत्पादन शुरू हो जाएगा।

- गंगू तेली

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